नई दिल्ली: एक तरफ जहां भारत अंतरिक्ष में कदम रख रहा है और डिजिटल क्रांति की ओर बढ़ हर गांव तक पहुंच रही है, वहीं रसोई की दुनिया में एक ऐतिहासिक उलटफेर देखने को मिल रहा है। आधुनिकता की दौड़ में जहाँ रसोई गैस (LPG) ने घर-घर अपनी जगह बना ली थी, वहीं आज कल के दिनों में गैस सिलेंडर की बढ़ती कीमतों और कुछ इलाकों में इसकी किल्लत ने महिलाओं को एक बार फिर अपने पुराने दिनों की याद दिला दी है। भारत के विशाल ग्रामीण और अर्ध-शहरी (कस्बाई) इलाकों में अब फिर से ‘देशी चूल्हों’ की धमक सुनाई देने लगी है, जो न केवल आर्थिक मजबूरी की कहानी बयां कर रही है, साथ ही हमारी विकास यात्रा पर एक सवालिया निशान भी खड़ा कर रही है।
मजबूरी में लौट रही है पुरानी यादें: ‘उज्ज्वला’ से ‘उपला’ तक का सफर
कभी प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (PMUY) जैसी स्कीम महत्वाकांक्षी योजनाओं ने लाखों गरीब परिवारों की महिलाओं को धुएं से मुक्ति दिलाई थी। मिट्टी के चूल्हे से निकलने वाले धुएं के कारण होने वाली बीमारियों से राहत दिलाने के लिए सरकार ने मुफ्त कनेक्शन देकर महिलाओं को गैस चूल्हे से जोड़ा था। लेकिन आज वही महिलाएं रसोई का बजट बिगड़ने के कारण मिट्टी के चूल्हों को फिर से थामने को मजबूर हैं।
उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गांव की रहने वाली सीता देवी (45) बताती हैं, “सरकार ने जब गैस कनेक्शन दिया था, तो बहुत अच्छा लगा था। धुएं से आंखें नहीं जलती थीं, बहू को खाना बनाने में आसानी थी। लेकिन अब एक सिलेंडर 900 रुपये के पार चला जाता है। दो महीने में एक सिलेंडर भी पूरा नहीं पड़ता। मजबूरी है कि अब लकड़ी और उपलों (कंडों) का इस्तेमाल शुरू कर दिया है।”
यह सिर्फ सीता देवी की कहानी नहीं है। बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और झारखंड के कई हिस्सों से ऐसी खबरें सामने आ रही हैं। बुजुर्ग महिलाओं के लिए यह पुरानी यादों का लौटना भले ही हो, लेकिन नई पीढ़ी की बहुओं के लिए यह एक कड़ा शारीरिक और मानसिक संघर्ष बनकर उभरा है। जिन्होंने कभी चूल्हे पर लकड़ी फूंकना नहीं सीखा, उन्हें अब वह विधि सीखनी पड़ रही है, और साथ ही झुलसती गर्मी और धुएं से भी जूझना पड़ रहा है।
आंकड़ों की जुबानी: कितनी बढ़ी महंगाई?
हाल के वर्षों में एलपीजी (LPG) की कीमतों में जबरदस्त उछाल आया है। कोविड-19 महामारी के बाद से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव ने घरेलू बाजार को सीधे प्रभावित किया है। जहां कभी सब्सिडी वाला सिलेंडर 500-600 रुपये में मिल जाता था, वहीं आज आम उपभोक्ता को एक सिलेंडर के लिए 900 से 1100 रुपये (शहर और एजेंसी के हिसाब से) तक खर्च करने पड़ रहे हैं।
हालांकि सरकार समय-समय पर कीमतों में कटौती करती है, लेकिन ग्रामीण अर्थव्यवस्था में आमदनी के सीमित साधनों वाले परिवारों के लिए यह राशि भी भारी पड़ती है। ऐसे में जंगलों से मुफ्त में मिलने वाली लकड़ी और खेतों में आसानी से उपलब्ध उपले (गोबर के कंडे) ही एकमात्र विकल्प बनकर रह गए हैं।
स्वाद और स्वास्थ्य की दुविधा: चूल्हे की धीमी आंच बनाम गैस की तेज रफ्तार
भले ही यह बदलाव मजबूरी में आया हो, लेकिन इसे लेकर एक दिलचस्प बहस छिड़ गई है। ग्रामीण महिलाएं अक्सर यह दलील देती हैं कि ‘देशी चूल्हे‘ पर धीमी आंच में बनी रोटियों और दाल का स्वाद गैस के चूल्हे पर नहीं आता।
“गैस की आंच पर तो खाना जल्दी पक जाता है, लेकिन उसमें वो बात नहीं आती,” मध्य प्रदेश के मंडला जिले की 60 वर्षीय कौशल्या बाई कहती हैं। “चूल्हे पर जब मिट्टी की हांडी में दाल चढ़ती है और लकड़ियों की धीमी आंच पर वो घंटों पकती है, तो उसका जो स्वाद और खुशबू आती है, वो LPG में नामुमकिन है।”
यह भावनात्मक जुड़ाव और परंपरागत स्वाद की चाहत भले ही सुखद हो, लेकिन इसके पीछा स्वास्थ्य का जो खतरा है, वह बहुत बड़ा है।
सेहत पर भारी पड़ सकता है ‘देसी स्वाद’ का चस्का
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की मानें तो ठोस ईंधन (लकड़ी, कोयला, उपले) के धुएं के कारण होने वाला वायु प्रदूषण घर के अंदर ही सबसे घातक साबित होता है। इस धुएं के लगातार संपर्क में रहने से महिलाओं में सांस की बीमारियां (दमा, ब्रोंकाइटिस), आंखों की जलन और मोतियाबिंद का खतरा बढ़ जाता है।
- स्वांस लेने पर प्रभाव: चूल्हे के धुएं में कार्बन मोनोऑक्साइड और अन्य जहरीली गैसें होती हैं, जो फेफड़ों को नुकसान पहुंचाती हैं।
- बच्चों पर असर: धुएं भरी रसोई में मां की गोद में रहने वाले छोटे बच्चों में निमोनिया का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
- आंखों पर असर: लगातार धुएं में खाना पकाने से आंखें लाल होना, जलन और रोशनी कमजोर होना आम बात है।
ऐसे में सिर्फ स्वाद के लिए या मजबूरी में इस ओर लौटना एक गंभीर स्वास्थ्य संकट को न्यौता देना है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
बजट पर भारी पड़ती रसोई: एक मजबूर विकल्प है चूल्हा
दिल्ली जैसे महानगर से लेकर छोटे कस्बों तक, हर जगह गृहिणियां महंगाई का दंश झेल रही हैं। आम गृहिणियों का कहना है कि रसोई गैस (LPG) अब एक विलासिता की वस्तु बनती जा रही है, जो आम आदमी की पहुंच से दूर होती जा रही है।
एक महीने का खर्चा निकालना ही जहां मुश्किल हो, वहां हर महीने या डेढ़ महीने पर एक हजार रुपये का सिलेंडर लाना कई परिवारों के बस की बात नहीं रह गई है। ऐसे में देशी चूल्हा ही एकमात्र सहारा बचा है, चाहे वह कितना भी तकलीफदेह क्यों न हो।
सरकार और प्रशासन से उम्मीदें
यह स्थिति सिर्फ एक आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि एक सामाजिक चुनौती है। सरकार से उम्मीद की जा रही है कि वह इस किल्लत/ परेशानी को दूर करे और यह सुनिश्चित करे कि महिलाओं को दोबारा धुएं और मशक्कत भरी पुरानी जिंदगी में न लौटना पड़े।
- उज्ज्वला योजना पर दोबारा फोकस: केवल कनेक्शन बांटना ही काफी नहीं है, बल्कि रिफिल की सब्सिडी को बढ़ाना और उसे सीधे लाभार्थियों के खाते में समय पर पहुंचाना जरूरी है।
- कीमतों पर अंकुश: अंतरराष्ट्रीय बाजार में उतार-चढ़ाव के बावजूद घरेलू स्तर पर कीमतों को नियंत्रित रखने के प्रयास करने होंगे।
- वैकल्पिक ऊर्जा को बढ़ावा: जहां LPG पहुंचना मुश्किल है, वहां सोलर कुकर या बायोगैस प्लांट जैसे विकल्पों को बढ़ावा देकर महिलाओं को सशक्त बनाया जा सकता है।
निष्कर्ष: विकास की राह में लौटते कदम
देशी चूल्हे की ओर यह लौटना भारत जैसी विकासशील अर्थव्यवस्था के लिए एक चेतावनी की तरह है। यह दर्शाता है कि बढ़ती महंगाई न केवल जीवन स्तर को प्रभावित कर रही है, बल्कि विकास के पिछले एक दशक में हासिल की गई स्वास्थ्य और जीवन-सुविधा से जुड़ी उपलब्धियों को भी निगल रही है।
भले ही मिट्टी के चूल्हे की रोटी में स्वाद हो, लेकिन उस स्वाद की कीमत किसी महिला या बच्चे की सेहत से नहीं ली जानी चाहिए। upxpress24.in की ओर से हम सरकार और संबंधित एजेंसियों से अपील करते हैं कि वे इस ओर गंभीरता से ध्यान दें, ताकि महिलाएं आधुनिक रसोई की सुविधा का लाभ उठा सकें और देश के विकास की मुख्यधारा से जुड़ी रहें।
अस्वीकरण: इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं और विभिन्न ग्रामीण क्षेत्रों में की गई बातचीत पर आधारित हैं। LPG मूल्य और सरकारी योजनाओं की जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध स्रोतों से ली गई है।